पुरानी से पुरानी खांसी का रामबाण इलाज: 7 दिनों में जड़ से खत्म करने वाला आयुर्वेदिक घरेलू नुस्खा
आज की तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी में लोग शारीरिक और मानसिक बीमारियों से घिरे हैं, और बिना सोचे-समझे एलोपैथी पर निर्भर हो जाते हैं। हमारा हेल्थ ब्लॉग 'Healthier Ways of Life' प्राकृतिक, आयुर्वेदिक और स्वर विज्ञान पर आधारित सरल व सस्ते उपायों के ज़रिए आपको स्वस्थ जीवन की दिशा में मार्गदर्शन देता है। समझें जड़ों को और अपनाएँ सच्चे समाधान! नोट: ऊपर बाई ओर 3 लाईन को क्लिक करें, ब्लॉग के features देखें। धन्यवाद..!! गुगल ट्रांसलेट के फीचर्स से विश्व के सभी भाषाओं में देखें
सांस सब कोई लेता है, इसी से जिंदगी चलती है,
लेकिन बहुत कम लोग ही जानते हैं कि इस सांस लेने-छोड़ने के तरीके को सही रूप से जान लेने के बाद हम साधारण से लेकर गंभीर बीमारियों तक के खतरे से बच सकते हैं।
इसके लिए आपको सिर्फ दिन में 8-10 मिनट का समय निकालना है — सुबह या फिर खाली पेट (भोजन के 3-4 घंटे बाद) अनुलोम-विलोम प्राणायाम करने का अभ्यास करें।
यह कोई कठिन प्रक्रिया नहीं है। कमर सीधी कर आराम के आसन में बैठ जायें और दाहिने हाथ के उंगली तर्जनी को बाईं नासिका पर और अंगुष्ठ को दाईं नासिका पर बिना दबाव के हल्के से टिका कर रखें और निम्न निर्देशानुसार प्रारंभ करें -
दाहिने हाथ की अंगुष्ठ से दाईं नासिका बंद करें और बाईं से गहरी सांस लेकर कुछ समय के लिए सामर्थ्य के अनुसार इसे रोके रखें
दांयी नाक से इसे धीरे-धीरे छोड़ें और छोड़ने के बाद कुछ देर के लिए रुक कर दायीं नाक से ही लंबी सांस खींचें (इस स्थिति में तर्जनी से बाईं नासिका बन्द रहे)
जितनी देर रोक सकें, इसे रोक कर रखें,
फिर बाईं नाक से सांस छोड़ें (दाहिनी नाक बंद कर)
➡️ इस प्रकार एक चक्र पूरा हुआ।
फिर दाईं नाक से शुरू कर, यही प्रक्रिया 4 चक्रों तक दोहराएं।
ध्यान रहे — जिस नाक से शुरू हो, उसी से अंत हो।
इसमें 8-10 मिनट से ज्यादा समय नहीं लगता।
इसके बाद, पूरा दिन यही सांस लेने का पैटर्न अपने मन में बिठा लेना है —
हाथ की उंगलियों के बिना भी इसी पैटर्न को अपनाना है। इस बात को जान लें कि एक बार में कोई एक नासिका ही गतिमान रहती है।
जानकारी के लिए:
जब हम सांस लेकर अंदर रोकते हैं — उसे आंतरिक कुम्भक कहते हैं
और जब सांस बाहर छोड़कर, कुछ देर रुककर दोबारा लेते हैं — उसे बाह्य कुम्भक कहते हैं
सिर्फ सांस लेने के इस पैटर्न को अपनाने मात्र से ही —
साधारण बीमारियाँ 1-2 दिन में
और भयंकर बीमारियाँ सप्ताह भर में दूर होने लगती हैं
आगे जीवनभर इसी विधि को अपनाते रहना है।
स्वस्थ तन, शांत मन — एक संतुलित जीवन का मूलमंत्र यही है।