🌸 गुरु की महिमा, गुरु से मिलन : जीवन का नया जन्म 🌸
"अध्यात्म-गुरु, श्रद्धा और विश्वास के मूर्त रूप होते हैं :"
प्राणों से भी प्यारे और सारे रिश्ते-नाते को बखूबी निभाते हैं श्री गुरुदेव ।"
"परमात्मा के प्रत्यक्ष स्वरूप जिन्हें हमारी पलकें अपलक होकर निहारती रहती हैं, क्योंकि हमारी सारी जरूरतें उन्हीं की करुणा से उसी तरह प्राप्त होती रहती हैं, जैसे नवजात को अपनी माता से। इस जगत में परमात्मा के साकार रूप हैं - वही राम, कृष्ण और शिव हैं। सच्चे गुरु की प्रथम प्राप्ति ही अति दुर्लभ है। आपकी दृष्टि उन्हें पहचानने में चूक नहीं की तो आप मालामाल हो गए। जिसके मालिक समर्थ गुरु हैं उसे किस बात की कमी और चिंता।"
क्या आपने कभी अनुभव किया है कि जीवन की राह जब कठिन होती है, तो कोई अदृश्य शक्ति आपका मार्गदर्शन कर रही होती है? यह शक्ति कोई और नहीं बल्कि गुरु की कृपा-दृष्टि होती है।
जिस दिन सच्चे गुरु का सान्निध्य मिलता है, उसी दिन जीवन एक नया मोड़ ले लेता है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे पुनर्जन्म मिल गया हो। मन का अंधकार मिटने लगता है और आत्मा के भीतर प्रकाश फैलने लगता है।
ध्यातब्य एक जरूरी बात :
शायद आपको कुछ अजीब लग रहा हो एक हेल्थ ब्लॉग में गुरु की महिमा का बखान की बातें क्या प्रासंगिक है? बिल्कुल आपकी सोच सही है और मैं आश्वस्त कर दूँ कि आप सही रास्ते पे हैं। इसे यों समझें कि बिगड़ी दिनचर्या और जीवनशैली से टाॅक्सिन जमा होकर जैसे असाध्य शारीरिक रोग का रूप ले लेते हैं। ठीक उसी तरह जन्मों जन्मों के संचित प्रारब्ध कर्मों से सूक्ष्म मन भी दूषित होता आ रहा है जिसमें विभिन्न प्रकार के मल, विक्षेप और आवरण जमा होकर एक मानसिक रोग बना दिए हैं जिन्हें सच्चे गुरु के आश्रित रहकर धीरे-धीरे निकाला जा सकता है। यह भी एक श्रेष्ठ जीवनशैली ही है जो बिना गुरु (सत) के संग किए असंभव ही जानिये, इसलिए इसे "सत्संग" कहते हैं।
🌿 जब जीवन ने घुटनों पर ला दिया, तब गुरु ने थामा – "मेरे जीवन का प्रसंग, जो भुलाते नहीं भूलता"
मेरा जीवन भी कभी उस मोड़ पर आ खड़ा हुआ था, जहाँ से आगे कुछ दिखता नहीं था। गुरु महाराज ने सब कुछ सुलझा दिया, जहाँ मेरा जीवन एक अबूझ पहेली बन कर रह गया था।
एक ऐसी अप्रत्याशित और पीड़ादायक स्थिति में, जब अपनों के द्वारा अपने को उत्तराधिकार से बेदखल कर दिया जाता है। स्वाभिमान और हैसियत सब चकनाचूर कर दिया जाता है।
मैं स्वयं एक शिक्षक होने के बावजूद अपने दर्द को किसी के सामने प्रकट करने योग्य नहीं था। लगता था – जब सबसे विश्वसनीय व्यक्ति ही विश्वासघात कर दे, तो इस संसार में अब भरोसा करने लायक कोई है भी क्या?
उसी निराशा और अंधकार में डूबे हुए समय में, एक दिन किसी ने रामाश्रम सत्संग, मथुरा की साधना-पत्रिका पढ़ने को दी।
मैंने उसे यूँ ही उलटना-पलटना शुरू किया — लेकिन वहीं से मेरी मुक्ति की राह खुल गई। मैंने समझ चुका था कि करुणासिन्धु गुरु की सत्ता जब तक जगत में है तब तक किसी की हैसियत नहीं जो इस संजीवनी "करुणा" की गला घोंट सके।
वहीं से मेरे जीवन का नया अध्याय प्रारंभ हुआ। मैंने उसी वर्ष रामाश्रम सत्संग मथुरा के टूंडला भंडारा जाने का निश्चय किया और वहाँ सम्मिलित हुआ। वहाँ गुरु के विराट स्वरूप के दर्शन के वह अविस्मरणीय पल मुझे याद आते ही खुशी के आंसू आ जाते हैं। मैं स्वयं को उनके हाथों बेंच दिया और उन्होंने मुझे स्वीकार कर खरीद लिया। मैं अब अनाथ नहीं रहा, एक ऐसे मालिक का गुलाम हो गया जहाँ से बिना माँगे सब कुछ मिल जाता है
टूंडला जहाँ परम पूज्य पंडित मिहीलाल शर्मा जी ने अपने गुरु समर्थ गुरु परम संत डॉ. चतुर्भुज सहाय जी की स्मृति में जो भव्य स्मृति भवन बनवाया है, वहाँ के भंडारे का वातावरण मेरे जीवन का टर्निंग पॉइंट बन गया।
मेरे हृदय की सारी पीड़ा, छल, क्रोध और टूटन — सब कुछ जैसे उस पवित्र वातावरण में पिघलने लगे।
वहाँ मैं अपने गुरु को नहीं, अपने अन्तरात्मा को पुनः खड़ा होते देख रहा था।
गुरु की महिमा को शब्दों में पिरोना कठिन है।
लेकिन मैं कह सकता हूँ — गुरु मेरे भीतर समा गए। मैंने खुद को उन्हें सौंप दिया और हल्का हो गया।
आज जो कुछ भी अच्छा सोचता हूँ, करता हूँ — वह उनका ही प्रभाव है।
मुझे लगता है मैं अब मात्र एक मैनेजर कि हैसियत रखता हूँ, मालिकपन मेरा निकल गया – कर्म करता हूँ, लेकिन परिणाम और दिशा का निर्णय मेरे गुरु के हाथ में रहता है। मैं ऊपर ऊपर देखता हूँ, लेकिन वे अन्दर से देखकर जो उचित होता है वही करते हैं। जो भी छोटा-बड़ा जोखिम उठाना पड़ता है,वह उनके द्वारा स्वीकृत कर दिया जाता है, उसके आगे पश्चाताप करना तो नादानी ही कहलाएगी।
🍃 गुरु का सान्निध्य: जीवन का असली प्रकाश
गुरु केवल ज्ञानदाता नहीं होते, वे जीवन की धुरी होते हैं।
उनकी वाणी में जीवन का लक्ष्य छिपा होता है।
जो उनके शब्दों को श्रद्धा से सुन ले, वह जीवन के सारे भ्रमों से मुक्त हो सकता है।
गुरु की शरण में जाना किसी धर्म या परंपरा का अनुसरण मात्र नहीं है, यह तो पूर्ण समर्पण की यात्रा है, जिसमें अहंकार पिघलता है और आत्मा का उत्थान होता है।
🌺 निष्कर्ष :
गुरु केवल एक व्यक्ति नहीं, वे एक चेतना हैं।
एक ऐसा दीपक जो हमें स्वयं की खोज करने में सहायता करता है।
उनकी छाया में रहकर जीवन सरल, शांत और दिव्य हो जाता है।
जिसने सच्चे गुरु को पा लिया, उसने सब कुछ पा लिया।
"गुरु की छाया में बिताया गया एक पल,
जीवन के हजारों संघर्षों से बड़ा होता है।"
तो क्या आपने अभी तक गुरु के रंग में खुद को भिगोया भी है या किनारे पर बैठ कर इंतजार ही कर रहे हैं, क्या गहरी ठोकर लगने के बाद भी अपने को उसी चक्की में पिसाते रहने की इच्छा है..? अपने स्वविवेक को जागृत कर संसार के दलदल से निकल कर आध्यात्म गुरु की खोज किजिए। अपनी जिज्ञासा को प्रबल बना कर ढूंढिए। यदि मिल जाएँ तो उन पर श्रद्धा और विश्वास लाकर अपना सब कुछ न्योछावर कर दिजिए! फिर देखिए क्या कमाल हो जाता है। जीवन पुष्प सा हल्का बन जाएगा और यह लक्ष्य को पाने के लिए गंतव्य की ओर अग्रसर हो जाएगा ।
यदि नहीं, तो अभी वक्त है...!
श्रद्धा की आंखें खोलिए, विश्वास का दीप जलाइए,
और गुरु के सान्निध्य में जीवन को नया जन्म दीजिए।
लेखक : विजय कुमार कश्यप